शुक्रवार 1 मई 2026 - 22:26
शिक्षक और मजदूर, संस्कृति और अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं

इस्लामी क्रांति के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह सय्यद मुज्तबा खामेनई ने मजदूर दिवस और शिक्षक दिवस के अवसर पर एक संदेश जारी किया है, जिसमें समाज के इन दो महत्वपूर्ण वर्गों के महत्व की ओर इशारा किया गया है। उन्होंने शिक्षकों और मजदूरों के स्थान और उनके पद की प्रशंसा करते हुए, ईरान की तरक्की और प्रगति के दुश्मनों को निराश करने और उन्हें शिकस्त देने के आर्थिक और सांस्कृतिक जिहाद में उनके महत्व को सैन्य मैदान के महत्व के समान बताया। उन्होंने शिक्षकों को सांस्कृतिक जंग की सबसे प्रभावशाली कड़ी और मजदूरों को आर्थिक जंग के सबसे प्रभावशाली तत्व बताते हुए, शिक्षकों और मजदूरों को संस्कृति और अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी से परिभाषित किया।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, इस्लामी क्रांति के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह सय्यद मुज्तबा खामेनई ने मजदूर दिवस और शिक्षक दिवस के अवसर पर एक संदेश जारी किया है, जिसमें समाज के इन दो महत्वपूर्ण वर्गों के महत्व की ओर इशारा किया गया है। उन्होंने शिक्षकों और मजदूरों के स्थान और उनके पद की प्रशंसा करते हुए, ईरान की तरक्की और प्रगति के दुश्मनों को निराश करने और उन्हें शिकस्त देने के आर्थिक और सांस्कृतिक जिहाद में उनके महत्व को सैन्य मैदान के महत्व के समान बताया। उन्होंने शिक्षकों को सांस्कृतिक जंग की सबसे प्रभावशाली कड़ी और मजदूरों को आर्थिक जंग के सबसे प्रभावशाली तत्व बताते हुए, शिक्षकों और मजदूरों को संस्कृति और अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी से परिभाषित किया।

सर्वोच्चन नेता के संदेश का पाठ इस प्रकार है:

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्राहीम

पहली और दूसरी मई के दो दिन, ऐसे दिन हैं जिनमें मजदूरों और शिक्षकों को श्रद्धांजलि दी जाती है। केवल शाब्दिक और प्रतीकात्मक श्रद्धांजलि से हटकर, जो अपने आप में एक उचित और सही काम है, किसी भी देश की प्रगति, ज्ञान और कर्म के दो पंखों पर निर्भर है। शिक्षक, इस उद्देश्य को व्यावहारिक रूप देने के पहले चरण में भूमिका निभाता है।

ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा, कौशलों में वृद्धि और आने वाली पीढ़ी के बौद्धिक विकास और उसकी पहचान के ढाँचे के निर्माण की बड़ी जिम्मेदारी उसके कंधों पर है। वे छात्र और धार्मिक विद्यार्थी जो किसी भी शिक्षक की देखरेख में पलते-बढ़ते हैं, निकट भविष्य में अपने सीखे हुए कौशलों और प्राप्त ज्ञान को व्यवहार में लाएँगे और इंशाअल्लाह जीवन के विभिन्न क्षेत्रों, घर के प्यार भरे माहौल से लेकर काम की जगहों और गलियों-नुक्कड़ों तक में अपने नैतिकता, व्यवहार और बातचीत में अपने शिक्षकों के किरदार और कथन की झलक पेश करेंगे।

दूसरी ओर, काम का क्षेत्र एक विस्तृत क्षेत्र है जो पूरे देश में फैला हुआ है, घरों, कार्यालयों, व्यापारिक केंद्रों और मस्जिदों से लेकर खेतों, कारखानों, खानों और विभिन्न सेवा क्षेत्रों तक में व्याप्त है। यह विस्तृत क्षेत्र जितना अधिक कर्म और कर्तव्यबोध जैसे दो मूलभूत तत्वों से सुसज्जित होगा, जो हर बड़ी सफलता की नींव हैं, उतनी ही अधिक देश की प्रगति की गारंटी बेहतर और मजबूत होगी।

हम जानते हैं कि एक मजदूर, अपने संकल्प और अच्छे कर्म के प्रकाश में कभी-कभी इतना ऊँचा स्थान प्राप्त कर लेता है कि एक मेहरबान शिक्षक और मुरब्बी की तरह उसके शक्तिशाली और कलाकार हाथों पर भी शुक्रिया और सम्मान का बोसा देना चाहिए। बेशक यह उस प्रारंभिक शिक्षा का परिणाम होता है जो प्रत्येक इंसान अपने पहले मुरब्बियों (माता-पिता) से पाता है और उसके बाद शिक्षक के सामने आदर का घुटना टेकने से प्राप्त की जा सकती है।

अब जबकि इस्लामी गणतंत्र ईरान ने सैंतालीस साल से अधिक संघर्ष के बाद अल्लाह के कृपा तथा अनुग्रह से अपनी तरक्की और प्रगति के विरोधियों के साथ सैन्य मैदान में अपनी अभूतपूर्व शक्ति का कुछ हिस्सा दुनिया के सामने साबित कर दिया है, तो आर्थिक और सांस्कृतिक मैदान में भी उन्हें निराश करना और उन्हें शिकस्त देना आवश्यक है।

शिक्षक सांस्कृतिक मैदान में सबसे प्रभावशाली कड़ी और मजदूर आर्थिक मैदान में सबसे महत्वपूर्ण तत्व होंगे, इसलिए कहा जा सकता है कि ये दोनों, संस्कृति और अर्थव्यवस्था के ढाँचे की रीढ़ की हड्डी की हैसियत रखते हैं। अतः आवश्यक है कि वे अपनी इस महत्वपूर्ण विशेष हैसियत के महत्व को, नौकरी और काम से बढ़कर, जिसे करने के बदले में मजदूरी दी जाती है, भली-भाँति जानते हों।

जैसा कि इस काम के साथ इस बात पर भी ध्यान रखना चाहिए कि हर साल या हर कुछ समय बाद शाब्दिक श्रद्धांजलि देना अपनी जगह उचित है, लेकिन इन दोनों वर्गों की कोशिशों का मूल्यांकन इससे कहीं अधिक गहन और व्यावहारिक होना चाहिए। मुझे लगता है कि जिस तरह ईरान की प्यारी कौम सड़कों और चौराहों पर मौजूदगी के जरिए अपनी सैन्य फौजों का समर्थन कर रही है, उसी तरह उसे शिक्षकों और मजदूरों की मदद के लिए भी मजबूत व्यावहारिक पश्तपनाही का मुजाहिरा करना चाहिए।

जैसे स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों का प्रबंधन चलाने में छात्रों के परिवारों का सहयोग पहले से अधिक होना चाहिए और इसी तरह, देश में तैयार होने वाले उत्पादों के उपयोग को प्राथमिकता देकर उन्हें बनाने वाले मजदूरों, खासकर नुकसान उठा रहे व्यापारियों और कारोबारियों का समर्थन किया जाना चाहिए, ताकि वे यथासंभव कर्मचारियों की बर्खास्तगी से बचें, चाहे वे उत्पादन इकाइयों के हों या सेवा इकाइयों के, बल्कि हर मजदूर को जहाँ वह काम करता है, उस उत्पाद या सेवा इकाई की पूंजी समझें। बेशक सरकार को भी इस नेकनीयती वाले कार्य की यथासंभव समर्थन करनी चाहिए।

प्यारा ईरान, जैसा कि वह वर्षों के प्रयास के बाद एक सैन्य शक्ति के रूप में उभरा है, इंशाअल्लाह उसी तरह ईरानी-इस्लामी पहचान की लकीरों को रेखांकित करते हुए और उन्हें शिक्षकों के माध्यम से युवाओं के दिलो-दिमाग में रासिख़ करके, और देशी उत्पादों के उपयोग को प्राथमिकता देकर, जो ईरानी मजदूरों की कोशिश का नतीजा हैं, तरक्की और प्रगति की चोटियों की ओर गतिमान रहेगा। और यह सब इंशाअल्लाह, हमारे आक़ा इमाम ज़माना (अ) की दुआ-ए-खैर और वसीले से बहुत जल्द और बेहतर तरीक़े से अंजाम पाएगा। बे-इज़्निल्लाह तआला।

सय्यद मुज्तबा हुसैनी खामेनई
1 मई 2026

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